इमली के फयदे और इसके औषधीय गुण

इमली के फयदे और इसके औषधीय गुण

इमली के फयदे और इसके औषधीय गुण

इमली भारत का सदा हरा भरा रहने वाला विशाल पेड़ है, जो वर्षों तक फल देता रहता है। इस पेड़ की पत्तियों, फूल, फल, बीज, बीज का आवरण, छाल, लकड़ी, जड़ के कई औषधीय उपयोग हैं। भारत के उष्ण भागों में यह स्वयं उत्पन्न हो जाती है परंतु शोभा के लिए इसे बाग, बगीचों, सड़कों के किनारे आदि स्थानों पर लगाया जाता है। क्षारीय व लवणीय भूमि पर यह काफी अच्छी उपज देता है।

इमली का पेड़ करीब 30 मीटर ऊंचा, घना व शिखरयुक्त होता है। इसकी पत्तियां छोटी, करीब 1 सेंटीमीटर लंबी होती हैं जो 5 से 10 सेंटीमीटर लंबी डंडी के दोनों ओर 10 से लेकर 20 की संख्या में जुड़ी रहती हैं। इसके फूल छोटे, पीले और लाल धारियों के होते हैं। इसके फल फली के रूप में लगते है। पकी फलियों के अंदर कत्थई रंग का रेशेदार गूदा रहता है।

इमली के पेड़ तीन प्रकार के होते हैं – खट्टे फलों वाला, मीठे फलों वाला तथा लाल फलों वाला। इनमें लाल फलों वाले का सर्वाधिक महत्व है। इसकी फलियां पकने के बाद इकट्ठी करके रखी जा सकती है। फलियों के अंदर चमकदार कत्थई रंग के आवरण के चपटे, कड़े 3 से 10 तक बीज रहते हैं।

इमली में नीबू से ज्यादा अम्लता रहती है। प्राकृतिक रूप से उगने वाले फलों में पकी इमली में शायद सबसे ज्यादा अम्लता पाई जाती है। कच्ची इमली में अम्लता के साथ मिठास भी होती है व खाने में नर्म होती है।

इमली की फलियां

कच्ची इमली बहुत खट्टी, रुचिकर, भारी, गरम, मलरोधक, अग्निदीपक, वातनाशक, कफ, पित्त कारक एवं आमकारक है। यह वात शूल रोग में पथ्य है।

पकी इमली मधुर, खट्टी, शीतल, रुचिकारक, दाह लू, कृमि, उदररोग एवं अतिसार नाशक है। यह भूख बढ़ाने वाली, अजीर्ण दूर करने वाली, गर्मी से बचाने वाली, कृमिनाशक, प्यास कम करके शरीर को ठंडक पहुचाने वाली, अफारा दूर करने वाली, मूर्छा दूर करने वाली, प्रमेह का नाश करने वाली होती है।

पकी नई इमली वात कफ कारक होती है पर एक वर्ष पुरानी वात पित्त नाशक होती है। यह जितनी पुरानी हो, उतनी ही ज्यादा लाभप्रद रहती है।

मधुर, खट्टी, स्वादिष्ट, रुचिकारक, स्तंभक, रेचक, पाचक होने के कारण इमली की फलियां सबसे अधिक महत्व की हैं। यह स्कर्वी रोकने व दूर करने में सहायक है। इसके गूदे का उपयोग खाद्य पदार्थों में कई प्रकार से किया जाता है।

कढ़ी व भाजी में इसकी पत्तियां काम में ली जाती हैं। इसके बीज निकाल कर, हींग नमक लगाकर धूप दिखाकर रख ली जाती है, फिर यह साल भर तक खराब नहीं होती है।

इमली की चटनी, शर्बत, हृदय व अमाशय को शक्ति देता है। इमली का शर्बत पुरानी कब्ज को जड़ से दूर कर देता है। धूप व लू में इमली और गुड़ का प्रयोग रामबाण दवा हैं।

पकी हुई इमली के गूदे को हाथ-पैरों के तलवों पर मलने से लू का असर मिट जाता है। मिश्री के साथ इमली का रस पीने से हृदय की दाह मिटती है।

इमली का गूदा पानी के साथ उबालकर शक्कर मिलाकर लेने से पेट का आफरा व कब्ज में फायदा करता है। फोड़े फुंसी में पीलिया में इमली का पानी पिलाना लाभदायक रहता है।

इमली की पत्तियां

आयुर्वेद के अनुसार इमली की पत्तियां आंख, कान के रोग, सूजन, रक्तविकार, चेचक व सर्पदंश में उपयोगी है। पत्तियों के क्वाथ से पुराने नासूर धोने से लाभ होता है, सूजन दूर होती है।

पत्तियों का रस कृमिनाशक है, यह पेट के सारे विकार मिटाता है। पत्तों का रस खूनी बवासीर में लाभदायक है। पत्तों के क्वाथ में काला नमक मिलाकर पीने से खांसी ठीक होती हैं।

पत्तों के रस को तिल के तेल में पकाकर कान में डालने से कान का दर्द मिटता है। पत्तों का रस दाद पर लगाने से खुजली शांत होती है।

इमली के बीज

आधा किलो इमली के बीज के टुकड़े करके पानी में भिगो दें, जब तक कि उनके छिलके न उतर जाएं, तब तक रोज पानी बदलते रहें। छिलके उतार कर बीजों को छाया में सूखाकर पीस लें। उसमें उतनी ही मिश्री मिलाकर रखें। प्रतिदिन सुबह-शाम गर्म मीठे दूध के साथ एक-एक चम्मच इस मिश्रण का सेवन करें, करीब 50 दिनों तक। इससे युवकों की शीघ्रपतन की शिकायत दूर होगी।

बीजों को उबालकर, पीस कर फोड़ों व सूजन पर लगाने से आराम मिलता है। बीजों के ऊपर का लाल छिलका, पेचिश, अतिसार की उत्तम औषधि है। बीजों को पीसकर मठ्ठे के साथ लेने से रक्तातिसार, आमातिसार में लाभ होता है।

इमली के फूल-छाल-लकड़ी

फूल, कफ व प्रमेह को दूर करते हैं। छाल श्वांस की बीमारी में तथा वात विकार में फायदा करती है। छाल की भस्म मंदाग्नि, वात, कफ, शूलनाशक हैं।

इमली के नुकसान

कच्ची इमली से दांत खट्टे, जबड़ों का दर्द तथा सिर दर्द हो सकता है। ज्वर, कफ, वात में तथा मासिक के दौरान स्रियों को इमली नहीं खानी चाहिए। दूध के साथ इसका सेवन नहीं करना चाहिए।